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ओवरथिंकिंग क्यों होती है और इसे कैसे कम करें?

Dr Kanhaiya Kachhawa

Dr Kanhaiya KachhawaMBBS, MD (Psychiatry), Psychiatrist, Bikanerसमीक्षा: 31 अक्टूबर 2026

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संक्षेप में

दिमाग समस्या सुलझाने के लिए बना है। जब समस्या असली होती है, तो हल मिलते ही वह शांत हो जाता है। लेकिन जब कोई कमी सिर्फ़ मानी हुई हो, तो उसका हल नहीं मिलता और दिमाग चलता रहता है। ओवरथिंकिंग कम करने के लिए अपने बारे में कही जाने वाली बातों को बदलना ज़रूरी है।

दिमाग बार-बार क्यों चलता रहता है?

मान लीजिए पास में आग लगी है। दिमाग तुरंत हमें वहाँ से हटाता है और समस्या खत्म होते ही शांत हो जाता है। भूख लगने पर भी यही होता है: खाना मिला और बात खत्म।

पर अगर हमने मान लिया है कि कोई कमी है, जबकि वह असल में नहीं है, तो दिमाग उसका हल ढूँढता रहता है। हल मिलता नहीं, इसलिए वह शांत भी नहीं होता। इसी को ओवरथिंकिंग कहते हैं।

ओवरथिंकिंग का क्रम
  1. मान लेना: मुझमें या मेरे जीवन में कमी है
  2. दिमाग का कमी पूरी करने में लगना
  3. हल न मिलना और विचार चलते रहना
  4. दिमाग की थकान और मन का भारी होना

जब तक वह मान्यता रहती है, दिमाग को आराम नहीं मिल पाता।

मानी हुई समस्या के उदाहरण

इसका खुशी के रसायनों से क्या संबंध है?

सेरोटोनिन और डोपामिन को खुशी के रसायन कहा जाता है। ये दिमाग के खास न्यूरॉन्स में बनते हैं, जिन्हें एक फैक्ट्री की तरह समझ सकते हैं। दिमाग लगातार चलता रहे तो वह ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस में जा सकता है, जो इस फैक्ट्री के काम पर असर डालता है। इसलिए ओवरथिंकिंग में मन भारी और उदास लग सकता है।

जैसे गाड़ी को बिना रुके चलाते रहने से इंजन पर ज़ोर पड़ता है, वैसे ही दिमाग को भी आराम चाहिए। सामान्य रूप से रात की नींद में दिमाग को यह आराम मिलता है।

क्या करें?

1. अपनी बातों पर ध्यान दें

देखें कि आप दिनभर अपने बारे में क्या कहते हैं। "मैं खराब हूँ" या "मुझसे नहीं होगा" जैसी बातें पहचानें।

2. बात को बदलें

एक पुरानी सीख है: जो हुआ, अच्छे के लिए हुआ। जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा होगा। ऐसी बात कहने पर दिमाग को कोई कमी पूरी करने की ज़रूरत नहीं लगती, और वह शांत हो सकता है।

परीक्षा देने वाला छात्र "मेरा सिलेक्शन नहीं होगा" की जगह कह सकता है: "मैं अच्छी तैयारी कर रहा हूँ और अपना पूरा प्रयास करूँगा।" इससे पढ़ाई पर ध्यान देना आसान होता है।

3. अभ्यास जारी रखें

ये बातें वर्षों से दोहराई गई होती हैं, इसलिए एक-दो बार कहने से नहीं बदलतीं। दरवाज़ा बाहर की ओर खुलता हो, तो अंदर धकेलने से नहीं खुलेगा। तरीका बदलना पड़ता है, और CBT का नियमित अभ्यास यही सिखाता है।

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