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अतीत में अटका मन: अपराधबोध और "काश ऐसा न होता" वाली सोच

Dr Kanhaiya Kachhawa

Dr Kanhaiya KachhawaMBBS, MD (Psychiatry), Psychiatrist, Bikanerसमीक्षा: 7 नवंबर 2026

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संक्षेप में

जब कोई बीती बात मन से नहीं निकलती, तो दिमाग लगातार तनाव में रहता है, और इसका असर सिर या पेट जैसी शारीरिक तकलीफ़ों के रूप में भी दिख सकता है। ये दोनों केस दिखाते हैं कि दोष देने या खुद को दोषी मानने वाले विचार को परखने से बीती बात को स्वीकार करना आसान हो सकता है।

केस 1: ब्रेकअप और माता-पिता पर गुस्सा

एक 28 वर्षीय व्यक्ति के सिर में हर समय भारीपन और सूनापन रहता था। CT, MRI और खून की जाँचें नॉर्मल थीं। बातचीत में पता चला कि कॉलेज के दिनों का उनका रिश्ता टूट गया था, क्योंकि माता-पिता ने उन्हें घर का काम सँभालने के लिए वापस बुला लिया था।

उनके मन में यही चलता रहता था: "अगर उन्होंने मुझे न बुलाया होता, तो सब ठीक रहता।" इसकी वजह से वे माता-पिता से चिढ़े रहते और घर में झगड़े होते थे।

विचार को परखना

क्या माता-पिता ने उन्हें इस इरादे से बुलाया था कि उनका रिश्ता टूटे? नहीं। बच्चों को घर बुलाना आम बात है। जब इरादा ही नहीं था, तो वे इस ब्रेकअप के ज़िम्मेदार भी नहीं हैं।

दूसरा पहलू देखना

"काश ऐसा न होता" वाली सोच हमेशा बेहतर तस्वीर दिखाती है। पर दूसरा पहलू भी हो सकता है: अगर वहीं रहते-रहते रिश्ता टूटता, तो वे अकेले होते। यहाँ परिवार उनके साथ है। जो हुआ, उससे बुरा भी हो सकता था।

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