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साँस सोच-सोचकर लेनी पड़ती है? जाँच के बाद एंग्ज़ायटी से इसका संबंध

Dr Kanhaiya Kachhawa

Dr Kanhaiya KachhawaMBBS, MD (Psychiatry), Psychiatrist, Bikanerसमीक्षा: 2 नवंबर 2026

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संक्षेप में

कुछ लोगों को लगता है कि सोचकर साँस न ली, तो साँस रुक जाएगी। जाँच नॉर्मल होने पर इसका संबंध एंग्ज़ायटी से हो सकता है। साँस पर ध्यान और डर एक-दूसरे को बढ़ाते हैं। इसलिए साँस से ज़्यादा उसके पीछे के डर पर काम करना मदद कर सकता है।

एक केस

एक 30 वर्षीय व्यक्ति को साँस खींचकर और मुँह खोलकर लेनी पड़ती थी। उन्हें लगता था कि सोचकर साँस न ली, तो वह आएगी नहीं। इसी डर से कई बार वे रात को सो नहीं पाते थे, और दिनभर घबराहट व सीने में भारीपन रहता था।

उनकी चेस्ट एक्स-रे, फेफड़ों की जाँच (PFT), खून की जाँच और ECG नॉर्मल आई।

मन और साँस का क्या संबंध है?

मन और फेफड़े ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम के ज़रिए जुड़े हैं। एंग्ज़ायटी में यह सिस्टम गड़बड़ाता है, तो साँस में तकलीफ़ महसूस हो सकती है। वह तकलीफ़ डर बढ़ाती है, और डर से तकलीफ़ और बढ़ती है।

साँस और डर का चक्र
  1. नेगेटिव विचार
  2. एंग्ज़ायटी
  3. साँस में तकलीफ़
  4. और ज़्यादा घबराहट

अगर तकलीफ़ अचानक बढ़कर थोड़ी देर में पूरी तरह ठीक हो जाती है, और व्यस्त रहने पर ध्यान में नहीं आती, तो जाँच के बाद यह पैटर्न एंग्ज़ायटी की ओर इशारा कर सकता है।

असली डर कहाँ था?

इन व्यक्ति को डर रहता था कि कुछ छूने या बिस्तर पर बैठने से उनका वीर्य वहाँ लग जाएगा, और घर की कोई महिला उसे छूकर प्रेग्नेंट हो जाएगी। इसलिए वे चीज़ों को छूने से बचते थे, और छू लेने पर कई बार हाथ धोते थे। यही लगातार डर उनकी एंग्ज़ायटी का कारण था।

तथ्य यह है कि बिस्तर या किसी चीज़ को छूने से किसी को प्रेग्नेंसी नहीं होती। ऐसे विचार बार-बार परेशान करें और मन न माने, तो यह OCD जैसा पैटर्न हो सकता है।

क्या करें?

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