सालों से इलाज, फिर भी राहत नहीं: कौन सी आदतें समस्या को बनाए रखती हैं?

Dr Kanhaiya KachhawaMBBS, MD (Psychiatry), Psychiatrist, Bikanerसमीक्षा: 4 नवंबर 2026
संक्षेप में
दवा दिमाग के रसायनों पर काम करती है, पर सालों में बनी सोचने की आदतें अभ्यास से बदलती हैं। अतीत से वर्तमान की लगातार तुलना और "कुछ भी कर लो, आराम नहीं मिलेगा" जैसी बात खुद से कहते रहना, ये दोनों समस्या को बनाए रख सकती हैं। इन्हें पहचानकर नियमित अभ्यास करने से इलाज बेहतर काम कर सकता है।
दवा क्या करती है, और क्या नहीं?
लगातार चलते विचार और ओवरथिंकिंग दिमाग में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकते हैं, जिससे रसायनों का संतुलन बिगड़ता है। दवा इस असंतुलन को सुधारने में मदद करती है, और इसका अपना ज़रूरी काम है।
पर दवा यह नहीं चुनती कि कौन सा विचार नेगेटिव है और कौन सा पॉज़िटिव। सोचने का तरीका एक सीख है, ठीक वैसे जैसे डॉक्टर बनने या संगीत सीखने के लिए अभ्यास करना पड़ता है। सालों में बनी गलत सीख को बदलने के लिए भी अभ्यास चाहिए।
आदत 1: अतीत से वर्तमान की तुलना
दिल्ली से आई एक महिला ने बताया कि वे पूरे दिन पॉज़िटिव रहने की कोशिश करती हैं, फिर भी अच्छा नहीं लगता। जब उनसे पूछा गया कि बीकानेर कैसा लगा, तो उन्होंने कहा कि यहाँ की सड़कें, इमारतें और हरियाली दिल्ली जैसी नहीं हैं।
वे शरीर से बीकानेर में थीं, पर मन से अब भी दिल्ली में। हर जगह की अपनी खूबसूरती होती है। जब हम वर्तमान को अतीत की नज़र से देखते हैं, "पहले सब अच्छा था, अब वो मज़ा कहाँ", तो वर्तमान अधूरा लगता है, दिमाग लगातार चलता है, और नींद व खाने तक पर असर पड़ता है।
आदत 2: "आराम तो नहीं मिलेगा"
एक 34 वर्षीय व्यक्ति 8 साल से एंग्ज़ायटी से परेशान थे। वे योग, ध्यान, दवा और साइकोथेरेपी, सब कर रहे थे, पर हर जगह खुद से यही कहते थे: "कितना भी कर लो, आराम तो नहीं मिलेगा।"
ऐसी पक्की बात दिमाग को उन्हीं बातों पर ध्यान देने देती है जो इस सोच को सही साबित करें, और राहत के छोटे-छोटे संकेत अनदेखे रह जाते हैं। जब उन्होंने इसे बदलकर कहना शुरू किया, "पहले सफलता नहीं मिली, पर अब मैंने तरीका बदला है", तो वही इलाज और अभ्यास असर दिखाने लगे। यह एक व्यक्ति का अनुभव है, और हर किसी में अलग हो सकता है।
समस्या बार-बार क्यों लौटती है?
रामायण में रावण के सिर कटकर बार-बार लौट आते थे, जब तक उसकी नाभि के अमृत तक बाण नहीं पहुँचा। एंग्ज़ायटी भी तब लौटती है जब उसकी जड़, यानी मन के नेगेटिव पैटर्न, बने रहते हैं। लक्षणों के साथ इन पैटर्न पर काम करना ज़रूरी है।
क्या करें?
- तुलना पहचानें: जब मन कहे "पहले बेहतर था", तो ध्यान अभी के अनुभव पर लाएँ: अभी क्या दिख रहा है, क्या सुनाई दे रहा है।
- पक्की बातें बदलें: "कभी ठीक नहीं होगा" की जगह "अभी तक नहीं हुआ, अब मैं तरीका बदल रहा हूँ" कहें।
- विचार को परखें: CBT में विचार लिखकर उसका सबूत देखना सीखें।
- अभ्यास जारी रखें: जो आदत सालों में बनी है, वह कुछ दिनों में नहीं बदलती। थोड़ी राहत मिले, तो समझें कि दिशा सही है।
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आगे क्या करें?
- CBT को चरण-दर-चरण सीखें: CBT Course
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